
देखा मैने ,
एसा कुछ देखा विशेष …..
जैसे मैं मुरझाता सा …
बेफिक्र रहा मैं वर्षों तक …
लुंज होती गयी पकड़ मेरी....
बस हाथ रहे हैं कुछ अवशेष ……..
देखा मैने ,
जब मातृभूमि के लाल विशेष …
लड़ जाने को , मर जाने को तत्पर थे …
बेडी से माँ को आज़ाद कराने को ..
ना रहे भगत , ना उन जैसा कोई …
बस हाथ रहे हैं कुछ अवशेष …...
देखा मैने
आजादी का हर पर्व विशेष ..
हर बार नयी आशा ,नया विश्वास
दूर देखता है लाल भवन ….
अब उत्साह कहाँ जिन्दा यारो …
बस हाथ रहे हैं कुछ अवशेष ……..…..
देखा मैने
लड़ते वीर ,कुछ जीतें जो थी विशेष
अमरत्व प्राप्त कर प्राप्त हुए …
वो मातृभूमि के मीलों पग …
सब नेहरु ने बिखरा ही दी ..
बस हाथ रहे हैं कुछ अवशेष ……....
देखा मैने
लुट जाते मन के भाव विशेष …..
सच से लोगो का हटता ध्यान …
नजरें धुंधली हैं मन बोझिल ..
अब स्वाभिमान मृत है लगभग …
बस हाथ रहे हैं कुछ अवशेष ……...
देखा मैने
गिरते मूल्य जो थे विशेष ….
कीमत का बाना भूल गए …
आजादी को चुकाई जो सब …
अब फिसल रही आजादी मेरी …
बस हाथ रहे हैं कुछ अवशेष ……..
देखा मैने
एसा भी है कुछ स्वप्न विशेष ..
जागेगा फिर ये सुसुप्त युवा …
मचलेगा फिर आज़ादी को ….
यूँ स्वप्न की यादें धूमिल है
बस हाथ रहे हैं कुछ अवशेष ……..
- नवीन कुमार सोलंकी
- नवीन कुमार सोलंकी

dubaara padha,
जवाब देंहटाएंman ke sare udgaar nikal diya hai bhai ne ...
bahut achhi rachana hai...
man garvit hua shbdo ka sanket dekhakar
nice kavita
जवाब देंहटाएंमनीष जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका जो आपने इस कविता को दूसरी बार पढ़ा.... आभार .....
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