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बुधवार, 20 जुलाई 2011

उम्मीद...................................


भले  छा  रहा  अँधेरा ,
लुप्त  हो  रहा  प्रकाश ,
भले  धुंधला  हो  चला हो  ,
तेरी  आशा  का  अभिलाष..

चढ़ते - चढ़ते शिलाओं पर ,
घुटनों  पे  भले  जख्म  के  निशान ,
रुकना नहीं  है  एक  पल  भी ,
जब  तक  ना  मिल  जाये  मुकाम ..

कुछ  बची - खुची आशा की किरण   ,
टूटे  कलश  से  निकाल  कर ...
पकड़  ले  मंजिल  की  राह ,
हवा  से  जुनूँ  उधर  लेकर ,

"कदमों  का  आकार  न  देख ,
जज्बों  का  तू  रुख  ले  तोल ...
अपने  कद  का  अंदाजा  रख ,
ये राह नहीं  ,पर  तू  अनमोल ..."





गिरता  है  तो  चल  उठ  फिर  से ,
अपने  सपनों  का  अम्बर  चुन ..
रुकना  नहीं है तुझको  राही  ,
सुन -सुन  मंजिल  की  पुकार  सुन ...

देख  तो  ये  विजय  पताका ,
तुझ  बिन कैसी  तन्हा  सी  है ...
अंदाजा  क्या ,तेरी  मंजिल 
तुझ  बिन  कैसी सुनसान सी  है ...

कर  आह्वान  उस  उमंग  का ,
जो सुषुप्त बीते  वक़्त  से ..
एक  नयी  शुरुआत  अभी  ,
हौसलों  के  बुलंद कदमों  से ...



कभी  न  कभी  इस  शिला  पर 
तेरे  घुटनों  की  सूरत  बनेगी ..
उम्मीद  है कि   जल्दी  ही ,
मंजिल  तुझको  मिलेगी ...
                                              -     नवीन कुमार सोलंकी