भले छा रहा अँधेरा ,
लुप्त हो रहा प्रकाश ,
भले धुंधला हो चला हो ,
तेरी आशा का अभिलाष..
चढ़ते - चढ़ते शिलाओं पर ,
घुटनों पे भले जख्म के निशान ,
रुकना नहीं है एक पल भी ,
जब तक ना मिल जाये मुकाम ..
कुछ बची - खुची आशा की किरण ,
टूटे कलश से निकाल कर ...
पकड़ ले मंजिल की राह ,
हवा से जुनूँ उधर लेकर ,
"कदमों का आकार न देख ,
जज्बों का तू रुख ले तोल ...
अपने कद का अंदाजा रख ,
ये राह नहीं ,पर तू अनमोल ..."
गिरता है तो चल उठ फिर से ,
अपने सपनों का अम्बर चुन ..
रुकना नहीं है तुझको राही ,
सुन -सुन मंजिल की पुकार सुन ...
देख तो ये विजय पताका ,
तुझ बिन कैसी तन्हा सी है ...
अंदाजा क्या ,तेरी मंजिल
तुझ बिन कैसी सुनसान सी है ...
कर आह्वान उस उमंग का ,
जो सुषुप्त बीते वक़्त से ..
एक नयी शुरुआत अभी ,
हौसलों के बुलंद कदमों से ...
कभी न कभी इस शिला पर
तेरे घुटनों की सूरत बनेगी ..
उम्मीद है कि जल्दी ही ,
मंजिल तुझको मिलेगी ...
- नवीन कुमार सोलंकी


