सोमवार, 18 जुलाई 2011

जज़्बात..................................



"हर जगह जो खिल रहे ;अल्फाज़ हैं तेरे -मेरे....
    बेवक्त ही जो चल बसे ;वो ख्वाब हैं तेरे - मेरे ....
       तू भी तो ज़ालिम ,रहा ना ;मेरी जिरह के वास्ते....
         जो कुछ बचा है आज वो; 'जज़्बात' हैं तेरे-मेरे......"
                                                                   -नवीन कुमार सोलंकी

6 टिप्‍पणियां:

  1. हर जगह जो खिल रहे ;अल्फाज़ हैं तेरे -मेरे....
    बेवक्त ही जो चल बसे ;वो ख्वाब हैं तेरे - मेरे

    वाह,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  2. बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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  3. बहुत खूब, लाजबाब !
    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  4. विवेक जैन जी.....बहुत बहुत शुक्रिया.....पढ़ते रहे हमारी कविताएं....:)

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  5. संजय जी बहुत बहुत धन्यवाद ......:)

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